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गुरु पूर्णिमा - महत्व और इतिहास



हिन्दू कलैण्डर में आषाढ़ में आने वाली पूनम को गुरु पूर्णिमा कहते है जो इस साल १३ जुलाई पे है ।  इस दिन जन्म हुआ था कृष्णा द्वैपायन यानि व्यास जी का जिन्होंने महाभारत लिखी थी।  आज हम जानेंगे उनके बारे में और इतिहास में गुरु पूर्णिमा के महत्व के बारे में। 


वेद व्यास जी का मूल नाम कृष्णा द्वैपायन था। व्यास का मतलब है वितरित करना , अलग करना आदि और वेद का मतलब जो हमारे चार वेद है , कृष्णा द्वैपायन जी ने जब हमारे वेदों को चार भाग में वितरित या अलग किया तब से उन्हें हम वेद व्यास के नाम से जानते  है। वेद व्यास जी त्रिकालदर्शी थे महाभारत में वे कई बार धृतराष्ट्र को , दुर्योधन को को सचेत करते दीखते है की जो तुम अभी कर रहे हो भविष्य में ये तुम्हारे लिए काल का कारण बनेगा। इतना ही नहीं जब महाभारत का युद्ध हो रहा था तब व्यास जी ने ही संजय जी को दिव्य चक्षु (आंख) प्रदान किया था जिसे वो युद्ध में जो भी हो रहा है वो देख के धृतराष्ट्र को बता सके। व्यास जी न सिर्फ वेदों को चार भाग में वितरित किया अपितु जो हमारे १८ पुराण है वो भी उन्होंने ही वितरित किये थे। एक ऋषि जो त्रिकालदर्शी,कवि ,ब्रह्मज्ञानी,तत्वदर्शी,और समाज सुधारक थे  उनके जन्म दिन पे हम गुर पूर्णिमा का त्यौहार मानते है। 


इतिहास में कई महान चरित्र हो गए श्री राम , श्री कृष्णा जैसे संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए गए भगवान के अवतार के जन्म दिन  को हम मानते है , पर हमारे ऐसे कई संत,ऋषि,गुरु हो गए जिन्हों ने इस देश की संस्कृति को ज़िंदा रखने के लिए अपना पूरा जीवन अर्पण किया आज का दिन उन महान चरित्रों को यद् करने का दिन है संत तुलसीदास, स्वामी विवेकानंद , स्वामी रामतीर्थ,संत कबीर जी,संत नानक जी,गुरु गोबिंद जी ,अदि शंकराचार्य जी जैसे कई सारे चरित्र है जिन्हो ने मानवमात्र का कल्याण हो इस लिए समाज में रह कर समाज के उद्धार का काम किया चाहते तो वो लोग गुफा में बैठ कर ध्यान में लीन रहते पर उन्हों ने समाज के उत्थान के बारे में सोचा आज का दिन उन सब को यद् कर के धन्यवाद देने का दिन है। 


गुरु का महत्व भारतीय संस्कृति में हमेशा से रहा है हमने ये श्लोक भी तो सुना ही होगा 


गुरु को ब्रह्मा,विष्णु और शिव जी के समतुल्य माना गया है, क्यों की गुरु का महत्व उस समय के समाज में बहुत था।  बच्चा ५-६ साल की उम्र से ही गुरुकुल जाता था और पूर्ण शिक्षा को प्राप्त कर गर लौटता था यहाँ पर गुरु न सिर्फ अच्छे संस्कार की शिक्षा देते अपितु सामाजिक जीवन में उपयोगी सारी शिक्षा दी जाती। आज गुरुपूर्णिमा पे स्कूल ,कॉलेजो में शिक्षको को प्रणाम करके समाप्त कर दी जाती है जो शिक्षक सिर्फ शरीर पोषण यानि रोज़गारलक्षी  शिक्षण देता है और गुरुपुर्णिमा के वास्तविक ध्येय को भुलाया जा रहा है , मेरा इसे कोई विरोध नहीं पर शिक्षक दिन तो है ही पर क्या इस व्यास पूर्णिमा  दिन को उन संतो, उन ऋषियों को याद नहीं करना चाहिए जिन्होंने पूरा जीवन अर्पण किया मानव समाज के विकास के लिए, इस संस्कृति के लिये।  शिक्षक सिर्फ़ वो पढ़ते है जो अभ्यासक्रम में  है और उनकी कामना उतने तक सिमित है की मेरा स्टूडेंट कल अच्छा कमा सके , पर एक गुरु की कामना होती है की भले ही कल को मेरा शिष्य अच्छा कमा न सके पर अच्छा नागरिक बने , वो खुश होने के लिए कभी चीज़ो का गुलाम न बने , वो अच्छा बेटा , अच्छा पति,अच्छा पिता बन सके इस लिए  हमारी संस्कृति में गुरु की महिमा ज़्यादा रही है। 


तो चलो इस गुरुपूर्णिमा से इस दिन उन महान संतो को याद करके उनको धन्यवाद दे की उनके कारण न सिर्फ हमारी संस्कृति टिकी रही पर उनके ही कारण हमें अर्जुन,स्वामी विवेकानद , शिवाजी जैसे महान चरित्र मिले , और  हमेशा से अपने जीवन से ज़्यादा महत्व समाज के उत्थान को दिया। 

फिर मिलते है आज का ब्लॉग पढ़ने की लिए धन्यवाद। 

जय श्री कृष्णा। 

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